देह से परे
सम्पूर्ण अस्तित्व है उसका
जहाँ विस्तार पाते हैं
उसके सपने, इच्छाएं
मर्जी और अधिकार भी।
उसको देह मात्र
समझने की भूल
छीन लेती है
उसका अस्तित्व, भविष्य
जीवन और प्यार भी।
चुभती निगाहों से दूर
उलझनों में खोयी
बुनती है वो
अपने जीवन के धागों से
एक प्यारा संसार भी।
माँ, पत्नी, बहन, दोस्त
इन रिश्तों के सिवा
खुद के भीतर
रखती है वो
नारी का आकार भी।
परम्परा, प्रतिष्ठा, अनुशासन
का ओढ़कर नक़ाब
मत छीनो उससे
उसके सपने, इच्छाएं
मर्जी और अधिकार भी।
विचारभूमि
शनिवार, 26 जनवरी 2019
देह से परे स्त्री
गुरुवार, 31 मई 2018
कैराना उपचुनाव : लौटता हिंदुस्तान
वैसे दर्द सबको होता है परन्तु, एक माँ का दर्द कहीं ज्यादा गहरा होता है| इस तहजीब ने मुझे बेहद सुकून दिया है| मेरे गाँव में मुस्लिमों की जनसंख्या ज्यादा नहीं है| मुख्यतः तीन घर हैं| खासतौर से मुझे कभी भी उनका घर, परिवार मेरे घर, परिवार से अलग महसूस नहीं हुआ| जैसे अन्य हिन्दू घर और लोग वैसे ही वो भी महसूस हुए| जब तक गाँव रहा- 12th तक, तब तक मुझे हिन्दू-मुस्लिम के बीच अलगाव वाली परिस्थितियों से अपरिचित रहा|
परन्तु, 2013 मुजफ्फरनगर के जाट-मुस्लिम संघर्ष ने मुझे विचलित कर दिया| किस तरह लोग मारे गए, बेघर हो गए और सदियों से चली आ रही भाईचारे की तहजीब, जिसे चौधरी चरण सिंह जी ने कायम किया था, वो धर्म कम राजनैतिक षड़यंत्र के बवंडर में छितरा गयी| चौधरी चरण सिंह जी ने पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भाईचारे का जो आवरण बनाया था जाट-मुस्लिम के बीच, वो आवरण टूट गया था| एक जमाने में खेती-किसानी और रोजगार के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहने वाला जाट-मुस्लिम समुदाय अपने बीच सरहदें खींचे बैठा था| ऐसा लगा शायद चौधरी चरण सिंह जी की जरूरत अब पश्चिमी उत्तरप्रदेश को नहीं रह गयी थी|
परन्तु, दोनों ही समुदायों को अपनी भूल का अहसास हुआ, सियासी चालबाजियों का ज्ञान हुआ और चौधरी चरण सिंह जी पुनः लौट आये- अपनों के बीच| 27-28 मई को कैराना उपचुनाव में राष्ट्रीय लोकदल की प्रत्याशी तबस्सुम हसन जी के पक्ष में जाट-मुस्लिम-दलित गठजोड़ ने चौधरी चरण सिंह जी के विचारों को सम्मान दिया| जिसके परिणामस्वरूप लगभग 45000 मतों से तबस्सुम हसन जी को विजय प्राप्त हुई| यह एक राजनैतिक दल/व्यक्ति से ज्यादा भाईचारे की जीत है- जिसके लिए दोनों ही समुदायों ने पुरजोर प्रयास किया; यह जीत है- उन घातक इरादों के विरुद्ध जो समाज को धर्म के नाम पर बांटकर एक-दूसरे की जान का प्यासा बना देते हैं; यह जीत है हिंदुस्तान की उस तहजीब की- जिसके बदौलत हमने विश्वभर में सम्मान पाया है; यह जीत है समाज के उस समुदाय की जो सबके लिए अन्न उगाकर...अन्नदाता कहलाया|
उनके हकों की लड़ाई को मजबूत करने के लिए कोई तो मौजूद है| इस परिस्थिति के नायक रहे जयंत चौधरी, जिनके लिए जीत से कहीं ज्यादा जरुरी था- पश्चिमी उत्तरप्रदेश पर 2013 में लगे राजनैतिक कलंक को मिटाकर भाईचारा कायम करना और वो इसमें पूरी तरह सफल रहे| उनको हार्दिक बधाई और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के हिन्दू-मुस्लिम समुदाय को सलाम....एक टीस जरूर रहेगी- काश यह समझदारी पहले दिखा दी होती लेकिन, उम्मीदों के साथ आगे बढ़ना पड़ता है और उम्मीद है ये समझदारी सदैव कायम रहेगी|
जय जवान...जय किसान
शनिवार, 11 फ़रवरी 2017
बेटी का एक खत......माँ के नाम
उसके लिए था बहुत ही खास|
सबसे पहले उसने ही पहचाना,मेरे आने की आहट को जाना।
जब मैं इस दुनिया में आयी,
सबने अपनी-अपनी कह सुनायी।
परन्तु,
वो माँ ही थी जो मुझे देख,
खुशी से फूली न समायी।
सबने अपनी-अपनी कह सुनायी।
परन्तु,
वो माँ ही थी जो मुझे देख,
खुशी से फूली न समायी।
उसके आँचल की गरमाहट,
जीवन का सबसे खुशनुमा अहसास।
उसकी आवाज की नरमी,
मेरे लिए है सबसे प्यारा उपहार।
जीवन का सबसे खुशनुमा अहसास।
उसकी आवाज की नरमी,
मेरे लिए है सबसे प्यारा उपहार।
अब रो देती हूँ, तो परेशान हो जाती है माँ
जब हँस देती हूँ तो खुश हो जाती है माँ।
मेरी हर नादानी पर बस हँस देती है माँ।
चाहे कितनी भी परेशान हो, कुछ नहीं बताती है माँ।
कुछ और ना देना चाहे मुझको,
हर जन्म देना यही माँ मुझको।
जब हँस देती हूँ तो खुश हो जाती है माँ।
मेरी हर नादानी पर बस हँस देती है माँ।
चाहे कितनी भी परेशान हो, कुछ नहीं बताती है माँ।
कुछ और ना देना चाहे मुझको,
हर जन्म देना यही माँ मुझको।
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