गुरुवार, 31 मई 2018

कैराना उपचुनाव : लौटता हिंदुस्तान



वैसे दर्द सबको होता है परन्तु, एक माँ का दर्द कहीं ज्यादा गहरा होता है| इस तहजीब ने मुझे बेहद सुकून दिया है| मेरे गाँव में मुस्लिमों की जनसंख्या ज्यादा नहीं है| मुख्यतः तीन घर हैं| खासतौर से मुझे कभी भी उनका घर, परिवार मेरे घर, परिवार से अलग महसूस नहीं हुआ| जैसे अन्य हिन्दू घर और लोग वैसे ही वो भी महसूस हुए| जब तक गाँव रहा- 12th तक, तब तक मुझे हिन्दू-मुस्लिम के बीच अलगाव वाली परिस्थितियों से अपरिचित रहा|
परन्तु, 2013 मुजफ्फरनगर के जाट-मुस्लिम संघर्ष ने मुझे विचलित कर दिया| किस तरह लोग मारे गए, बेघर हो गए और सदियों से चली आ रही भाईचारे की तहजीब, जिसे चौधरी चरण सिंह जी ने कायम किया था, वो धर्म कम राजनैतिक षड़यंत्र के बवंडर में छितरा गयी| चौधरी चरण सिंह जी ने पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भाईचारे का जो आवरण बनाया था जाट-मुस्लिम के बीच, वो आवरण टूट गया था| एक जमाने में खेती-किसानी और रोजगार के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहने वाला जाट-मुस्लिम समुदाय अपने बीच सरहदें खींचे बैठा था| ऐसा लगा शायद चौधरी चरण सिंह जी की जरूरत अब पश्चिमी उत्तरप्रदेश को नहीं रह गयी थी|
परन्तु, दोनों ही समुदायों को अपनी भूल का अहसास हुआ, सियासी चालबाजियों का ज्ञान हुआ और चौधरी चरण सिंह जी पुनः लौट आये- अपनों के बीच| 27-28 मई को कैराना उपचुनाव में राष्ट्रीय लोकदल की प्रत्याशी तबस्सुम हसन जी के पक्ष में जाट-मुस्लिम-दलित गठजोड़ ने चौधरी चरण सिंह जी के विचारों को सम्मान दिया| जिसके परिणामस्वरूप लगभग 45000 मतों से तबस्सुम हसन जी को विजय प्राप्त हुई| यह एक राजनैतिक दल/व्यक्ति से ज्यादा भाईचारे की जीत है- जिसके लिए दोनों ही समुदायों ने पुरजोर प्रयास किया; यह जीत है- उन घातक इरादों के विरुद्ध जो समाज को धर्म के नाम पर बांटकर एक-दूसरे की जान का प्यासा बना देते हैं; यह जीत है हिंदुस्तान की उस तहजीब की- जिसके बदौलत हमने विश्वभर में सम्मान पाया है; यह जीत है समाज के उस समुदाय की जो सबके लिए अन्न उगाकर...अन्नदाता कहलाया|
उनके हकों की लड़ाई को मजबूत करने के लिए कोई तो मौजूद है| इस परिस्थिति के नायक रहे जयंत चौधरी, जिनके लिए जीत से कहीं ज्यादा जरुरी था- पश्चिमी उत्तरप्रदेश पर 2013 में लगे राजनैतिक कलंक को मिटाकर भाईचारा कायम करना और वो इसमें पूरी तरह सफल रहे| उनको हार्दिक बधाई और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के हिन्दू-मुस्लिम समुदाय को सलाम....एक टीस जरूर रहेगी- काश यह समझदारी पहले दिखा दी होती लेकिन, उम्मीदों के साथ आगे बढ़ना पड़ता है और उम्मीद है ये समझदारी सदैव कायम रहेगी|
जय जवान...जय किसान